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परेशानियाँ दूर करने वाला पेड़

एक महिला थी। रोज वह और उसके पति सुबह ही काम पर निकल जाते थे। दिन भर पति ऑफिस में अपना टारगेट पूरा करने की *‘डेडलाइन’* से जूझते हुए साथियों की होड़ का सामना करता था।_


_बॉस से कभी प्रशंसा तो मिली नहीं और तीखी- कटीली आलोचना चुपचाप सहता रहता था।_


_पत्नी सरला भी- एक प्रावेट कम्पनी में जॉब करती थी। वह अपने ऑफिस में दिनभर परेशान रहती थी।_


_ऐसी ही परेशानियों से जूझकर सरला लौटती है, खाना बनाती है,शाम को घर में प्रवेश करते ही बच्चों को, वे दोनों - नाकारा होने के लिए डाँटते थे।_


_पति और बच्चों की अलग-अलग फरमाइशें पूरी करते-करते बदहवास और चिड़चिड़ी हो जाती है।_


_घर और बाहर के सारे काम उसी की जिम्मेदारी हैं।_


_थक-हार कर वह अपने जीवन से निराश होने लगती है। उधर पति दिन पर दिन अशांत होता जा रहा है।बच्चे विद्रोही हो चले हैं।_


_एक दिन सरला के घर का नल खराब हो जाता है। उसने प्लम्बर को नल ठीक करने के लिए बुलाया। प्लम्बर ने आने में देर कर दी।_


_पूछने पर बताया: कि साइकिल में पंक्चर के कारण देर हो गई। घर से लाया खाना मिट्टी में गिर गया,ड्रिल मशीन खराब हो गई,जेब से पर्स गिर गया...।_


_इन सब का बोझ लिए वह नल ठीक करता रहा।_

_काम पूरा होने पर महिला को दया आ गई- और वह उसे गाड़ी से, उसके घर छोड़ने चली गई।_


_प्लंबर ने उसे बहुत ही आदर से-चाय पीने का आग्रह किया।_


_प्लम्बर के घर के बाहर एक पेड़ था। प्लम्बर ने पास जाकर उसके पत्तों को सहलाया,चूमा और अपना थैला उस पर टांग दिया।घर में प्रवेश करते ही उसका चेहरा खिल उठा। बच्चों को प्यार किया,मुस्कराती पत्नी को स्नेह भरी दृष्टि से देखा और चाय बनाने के लिए कहा।_


_सरला यह देखकर हैरान थी। बाहर आकर पूछने पर प्लंबर ने बताया - यह मेरा परेशानियाँ दूर करने वाला पेड़ है।_


_मैं सारी समस्याओं का बोझा, रातभर के लिए इस पर टाँग देता हूं। और घर में कदम रखने से पहले मुक्त हो जाता हूँ।_


_चिंताओं को अंदर नहीं ले जाता।सुबह जब थैला उतारता हूं- तो वह पिछले दिन से कहीं हलका होता है। काम पर कई परेशानियाँ आती हैं, पर एक बात पक्की है-


मेरी पत्नी और बच्चे उनसे अलग ही रहें, यह मेरी कोशिश रहती है। इसीलिए इन समस्याओं को बाहर छोड़ आता हूं।


प्रार्थना करता हूँ- कि भगवान मेरी मुश्किलें आसान कर दें। मेरे बच्चे मुझे बहुत प्यार करते हैं, पत्नी मुझे बहुत स्नेह देती है,तो भला मैं उन्हें परेशानियों में क्यों रखूँ।उसने राहत पाने के लिए कितना बड़ा दर्शन खोज निकाला था...!_


_यह घर-घर की हकीकत है।_


_गृहस्थ का घर एक तपोभूमि है।सहनशीलता और संयम खोकर कोई भी इसमें सुखी नहीं रह सकता। जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं, हमारी समस्याएं भी नहीं।_

_प्लंबर का वह *‘समाधान-वृक्ष’ एक प्रतीक है* क्यों न हम सब भी एक-एक वृक्ष ढूँढ़ लें, ताकि घर की दहलीज पार करने से पहले अपनी सारी चिंताएं बाहर ही टाँग आएँ।


*_सदैव प्रसन्न रहिये।_*

*_जो प्राप्त है वही पर्याप्त है...!!


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