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सच सच बताना कितने लोगों ने नरकट की कलम से बचपन में लिखा है?

सच सच बताना कितने लोगों ने #नरकट की कलम से बचपन में लिखा है? नरकट की कलम और दवात में भरी रोशनाई से लिखने का मज़ा ही अलग होता था।नरकट के पेड़ तो आज भी मौजूद हैं लेकिन इसका इस्तेमाल अब कलम के लिए नहीं होता है।मड़ई/छप्पर आदि बनाने तक नरकट के पौधे का इस्तेमाल रह गया है।बचपन मे इसे सूखा कर कलम के साइज के टुकड़ों में काट कर कलम तैयार होती थी।हमारे मास्टर/मौलवी साहब इसे बनाने के लिए एक चाकू भी जेब में रखते थे।शार्पनर और इरेज़र नहीं था भाई उस वक़्त।लिखावट लेकिन शानदार होती थी।आज कलम और दवात का पूजन चित्रगुप्तजी महाराज के अनुयायियों तक ही सिमट कर रह गया है।

पहले ज़माने में शुभ घड़ी में कलम ,दवात और लकड़ी की पटरी का पूजन करने के बाद बच्चों की पढ़ाई शुरू होती थी। #सनातन_धर्म मे इसे विधा संस्कार कहा गया है।

गौरतलब है कि यूपी के #सिद्धार्थनगर ज़िले के मेरे पैतृक गांव का नाम भी "#नरकटहा " जो कि नरकट से बना है।





 

To tell the truth, how many people have written in childhood with a #Reed pen? The fun of writing was different from the reed pen and the light filled with the medicine. Reed trees still exist today but it is no longer used for pen The use of reed plant is left till making shanty / thatch etc. In childhood, it was dried and cut into pen-sized pieces to prepare the pen. Our master/maulvi sahib also used to keep a knife in his pocket to make it. There was no sharpener and eraser brother at that time. The handwriting was but brilliant. Today the worship of pen and medicine has been confined to the followers of Chitraguptji Maharaj.


In earlier times, after worshiping pen, medicine and wooden track in auspicious time, the education of children started. In Sanatan Dharma it is called Vidhi Sanskar.

It is worth mentioning that the name of my native village in Siddharthnagar district of UP is also "Narkatha" which is made of reeds.

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