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हमारे दौर के बचपन में हम कई शरारत ऐसी करते थे, जिसके बाद हमारा पिटना लगभग तय होता था।


हमारे दौर के बचपन में हम कई शरारत ऐसी करते थे, जिसके बाद हमारा पिटना लगभग तय होता था। चाहे मास्टर जी से पिटे, या अपने घरवालों से। उन्हीं में से एक शरारत ये थी कि , रुमाल को सीधा करके, उसकी चौड़ाई सीमित या गोल करके उसे चाबुक नुमा बना देते थे । उसके बाद उसी से अपने मित्रों पर पीछे से सट्ट से हमला करते थे। जो कि काफ़ी तेज़ लगता था। इसे स्वर्णिम यादें तो नही कह सकते पर ये भी हमारे बचपन की मस्ती का एक बड़ा उदाहरण हैं


In our childhood, we used to do many mischief like this, after which we were almost certain to be beaten up. Whether beaten by Master ji, or by his family members.

One of those mischief was that, by straightening the handkerchief, limiting or rounding its width, they used to make it like a whip. After that, he used to attack his friends from behind with bets. Which seemed pretty fast. It cannot be called golden memories but it is also a great example of our childhood fun.

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